Report : Rahul Bahal
विकासनगर में यमुना नदी की धारा पर तैरते सवालों का कौन देगा जवाब ?
सवाल – आखिर क्यों कुंभकरणी नींद में सोया है खनन विभाग?
सवाल – ढकरानी, भीमावाला में हरित पट्टी का ऐसे कैसे मिटाया जा रहा नामोनिशान?
सवाल – प्रतिबंधित क्षेत्र में क्रेशरस् कैसे हो रहे संचालित?
सवाल – यमुना नदी से RBM की किसके संरक्षण में हो रही लूट?
सवाल – क्या आसान कंजर्वेशन रिजर्व के नियम कायदे सिर्फ फ़ाइलों तक सीमित हैं?
सवाल – प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, NGT और अन्य जिम्मेदार विभागों की क्या है भूमिका?
सवाल – पूर्व सरकारों के कार्यकाल में आसान वेटलेंड के मानकों के चलते खनन संबंधी गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए थे, लेकिन अब सवाल यह उठता है कि अब ये गतिविधियाँ कैसे और किसकी अनुमति से यहाँ हो रही हैं?
सवाल – खनन गतिविधियों के चलते लुप्त होते जलीय और वनस्पति जीवन का कौन होगा जिम्मेदार?
सवाल – खनन गतिविधियों और क्रेशरस् का शोर प्रवासी परिंदों के जीवन चक्र पर भी पड़ रहा भारी?
जी हां तमाम नियम कायदों को ताक पर रख कर उत्तराखण्ड के विकासनगर में प्रतिबंधित आसन कंजर्वेशन रिजर्व क्षेत्र की परिधि में ढकरानी से भीमावाला तक संचालित एक दर्जन से अधिक स्टोन क्रेशर हैरतअंगेज रूप से दिन रात न सिर्फ आम जनजीवन को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि पर्यावरण और जैव विविधता के भविष्य पर भी कुठाराघात कर रहे हैं। इतना ही नहीं देश के पहले आसन कंजर्वेशन रिजर्व के 10 किलोमीटर के प्रतिबंधित दायरे में धड़ल्ले से बे हिसाब खनन गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। जबकि पूर्व में नियमों के अनुसार इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित रही है ऐसे में बड़ा सवाल यह कि वर्तमान में यहाँ कैसे खनन गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं।
वहीं सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि आखिर किसके संरक्षण में बेहद अव्यवस्थित तरीके से यमुना नदी से RBM को इन क्रेशर प्लांटस् तक पहुँचाया जा रहा है। क्रेशर प्लांटस् में RBM के पहाड़ लगे हुए हैं जो इस बात का सबूत हैं कि नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं निश्चित ही यमुना नदी में RBM की लूट मची हुई है। प्रदेश में जीवित प्राणी का दर्जा पाने वाली यमुना नदी के बीचों बीच से रात के अंधेरों में माँ यमुना की शांत धारा पर प्रहार कर दर्जनों डंपर दौड़ाये जा रहे हैं, खनन सामग्री को क्रेशर प्लांटस् से ढालीपुर, ढकरानी, भीमावाला से होते हुए मेन रोड तक पहुंचाया जा रहा है।
यमुना नदी एवं आसपास में खनन की इन गतिविधियों के चलते जलीय जीवन और वनस्पति जीवन पर भी अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ रहा है। नदी की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ और बड़े बड़े वाहनों के नदी की धारा में चलने के कारण मछलियों और अन्य जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वहीं यहाँ उत्पन्न शोर और आसपास की हरियाली पर धूल की मोटी परतें इस बात का प्रमाण हैं कि पर्यावरणीय मानकों की यहाँ खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। नियमों के अनुसार स्टोन क्रेशर के आसपास हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) विकसित करना अनिवार्य है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कहीं भी हरित पट्टी विकसित नजर नहीं आ रही है आसपास के पेड़ों पर जमी धूल खुद इस पूरे सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी है।
यमुना नदी एवं आसपास में स्थित इन क्रेशरस् से उत्पन्न कान फोड़ शोर ने आसान वेटलेंड क्षेत्र से सटी यमुना नदी में आने वाले साइबेरियाई मेहमान परिंदों का जीना भी हराम किया हुआ है जो कि अब यहाँ से नदारद हो गये हैं। इससे पहले तमाम प्रजातियों के सैकड़ों मेहमान परिंदे यहाँ भी कलरव करते देखे जाते थे अब इक्का दुक्का पंछी ही यहाँ दिखाई देते हैं। सर्दियों के दिनों में गूंजने वाली पक्षियों की चहचहाहट को अब मशीनों की गड़गड़ाहट ने लील लिया है यह सीधा वेटलेंड के इको-सिस्टम पर हमला है जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ी दुखद घटना है।
वहीं न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद क्रेशरस् से तैयार उपखनिज लेकर भारी भरकम वाहन शक्ति नहर के कमजोर पुलों से अब भी गुजर रहे हैं जिसके बारे में सूत्रों ने बताया है कि संबंधित विभाग ने इन पुलों की जिम्मेदारी ली है। हालाँकि यहाँ इन पुलों पर कभी भी बड़े हादसे हो सकते हैं हादसों की जिम्मेदारी किसकी होगी कहा नहीं जा सकता बहरहाल यहाँ सब हवा हवाई है।